08 मई 2018 को पुण्य तिथि पर श्रद्धांजली अमर शहीद द्वारिका प्रसाद की 20वा शहादत दिवस

मिट्टी के लाल : शहीद द्वारिका प्रसाद

प्रो० (डॉ०) मुन्द्रिका प्रसाद नायक

 

जब कभी हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखते है, तो पाते हैं कि महर्षि दधीची के पास एक समुदाय जाकर प्रार्थना करता है कि आपकी देह की आवश्यकता है। यदि आप देह दान नहीं करेंगे तो आपकी अस्थियों से बननेवाले बच्रधनुष के बिना राक्षसों का बिनाश संभव नहीं होगा। महर्षि कहते हैं “मैं समाधि में जाता हुं। कोई ऐसा पशु लाओ जो मेरे शरीर का मांस रक्त चाट ले ताकि तुम शेष बचे अस्थियों को लेजा सके!

इतिहास का यह पृष्ट हमारे सामने हैं। एक ऋषि को कोई आवश्यकता नहीं थी अपने देह देने की। उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले बहुत लोग होंगे, जो यह कह सकते थे कि तुम सब का यह निवेदन स्वीकार नहीं करेंगे। कोई ऋषि को बाध्य नहीं कर सकता था, परन्तु करुणा की सीमा, परोपकार की अवधि, और जीवन समर्पण करके समाज का रक्षण करने की परिकल्पना, दधीची में दिखलाई पड़ती है। यही कारण है कि वे हंसत-हंसते देह का दान कर देते है।

यह उदाहरण बतलाता है कि राष्ट्र की रक्षा करने वाले और विकास करने वाले व्यक्ति के चरित्र में बदलाव और त्याग करने. की भावना का होना आवश्यक है। राष्ट्र के चरित्र बदलने के लिए व्यक्ति और समाज के चरित्र में बदलाव आवश्यक है। इतिहास के इस उदाहरण के आइने में जब हम शहीद द्वारिका प्रसाद को देखते है तो वे शत्‌ प्रतिशत दधीची देखते है।

आप उस फूल को देखिए जो झाड़- झखाड के बीच निर्जन वन में बिना किसी अनुरछण और साधन के जनमता है तथा खिलता है और समाज के दुःख निवारण के लिए हवा के झंझावात वर्षा की फुहार और धूप की ज्वाला झेलता है, वह वनफूल होता है। शहीद द्वारिका प्रसाद वैसे ही वनफूल थे।

शहीद द्वारिका प्रसाद ,लोहियावादी अंम्बेदकरवादी और जगदेववादी तीनो ही थे। वे डॉ० लोहिया नहीं थे। डॉ० अंम्बेदकर नहीं थे और शहीद जगदेव भी नहीं थे। परन्तु इन तीनों से थोड़ा - थोड़ा अंश लेकर जो मूर्ती बनती है, वह मूर्ती शहीद द्वारिका प्रसाद की होती है। उनमें डॉ, लोहिया की निर्भीकता और ओजश्विता तथा डॉ« अंम्बेदकर की आभा और लडाकूपन एवं शहीद जगदेव के विचार और कर्म एक साथ समाहित थे।

शहीद द्वारिका प्रसाद का समाजिक चिंतन भारत की वर्ण व्यवस्था , जातीप्रथा , गैरबराबरी , पिछड़ापन / सांप्रदायिक समस्या , नारी समस्या , अंतरजातीय विवाह , ब्राह्मणवाद और अंधश्रद्धा के विनाश तथा विशेष अवसर के कार्यावयन पर आधारित है। उन्होंने भारतवर्ष के हजारों सालों की गुलामी का कारण जातिप्रथा ने भारत की 90% जनता को मुक दर्शक बनाकर छोड़ दिया है। भारत की 90% जनता बेजान है और 0% वरिष्ठ वर्ग कपटी पिछड़ी जातियां आज भी समाज में बंचना का शिकार है। वे अपने ही देश में विदेशी की तरह जी रहे है। उनकी भाषाएं कुचली जाती है। उनकी रोजी - रोटी छीन ली जाती है। उच्च जातिया अपने को वरिष्ठ बताकर शोषन करती है। ये शोषितो में हीन भावना भरने का काम करते है।

द्वारिका प्रसाद का मानना था कि “इस देश के छोटे आदमियों में जो हीन भावना है उसे हटाये बिना , उनका विकास संभव नहीं है।” इसके लिए आवश्यक है उन्हें विशेष मौका देना। मौका देने के कारण ही गड्ेरिया का बेटा क्रूश्वैव जो 26 वर्ष की उम्र तक कुछ भी पढ़ना - लिखना नहीं जानता था, मोची का बेटा स्टालिन, मोची का बेटा अब्राहम लिंकन और राजमिस्री का बेटा हिटलर, दुनिया में अपनी हस्ती को स्थापित कर सका। हमारे देश के अधिकांश लोगों को विशिष्ट वर्ग ने हजारों वर्षों से दिमाग के काम से अलग रखा है, उन्हें मौका नहीं दिया पढ़ने और बढ़ने का। दिमागी काम से उन्हें अलग रखा। धोबी को कह दिया “तुम कपड़ा धोओ” नाई को का दिया “तुम बाल काटो” चमार को कह दिया” तुम जुता सिलो” तेली को कह दिया “तुम तेल पेरो” अहीर को कह दिया “ तुम गाय चराओ” कोयरी को कह दिया “तुम खेत जोतो” कुम्हार को कह दिया “तुम बर्तन बनाओ” कहार को कह दिया “तुम पालकी ढोवो” इत्यादी - इत्यादी। दिमाग और राज - काज के मामले से उन्हें बिल्कुल अलग रखा। नतिजन वे पिछड़ गये। इसीलिए शहीद द्वारिका प्रसाद ने छोटे लोगों को सहारा देकर आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने की बात कही। इन वर्गों के लिए देश की गजटी नौकरियों, राजनैतिक पदो के नेतागिरी, पलटन, व्यापार और न्यायपालिका आदि में 90% आरक्षण की जरूरत बतलाई। वे शहीद जगदेव प्रसाद के दर्शन और दीशा के प्रती आजीवन समर्पित रहे। उनके शोषित क्रांति के मंत्र को जन जन तक पहुंचाने के लिए संघर्षरत रहे।

हम जानते है कि जो व्यक्ति संघर्ष की दिशा में आगे चलता है, उसकी सफलता, उसके साथ चलती है। लंबे संघर्ष यात्रा के कारण उस व्यक्ति में अवर्णनीय भव्यता आ जाती है। बेकार और निष्क्रिय व्यक्ति का भविष्य बेकार और निष्क्रिय हो जाता है। इस जीवन मंत्र को द्वारिका प्रसाद बखूबी समझते थे। इसी लिए उन्होंने आंदोलन और संघर्ष को ही अपने जीवन का रास्ता बनाया था। शहीद द्वारिका प्रसाद जिनका जन्म 4 जुलाई 1947 ई० और अवसान 8 मई 1999 ई० को हुआ था। पौया प्रखण्ड, जिला गया के मराची गांव के निवासी थे। इनके साथ मेरा अद्योपांत संबंध रहा, चाहे शोषित समाज दल का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन डेहरी - ओंन - सोन हो, राजनैतिक गोष्ठीयां हो, सेमिनार हो, जन आंदोलन हो, पाखण्ड विरोधी प्रदर्शन हो, 1977 तक हम सब साथ - साथ रहे।

1974 जे०पी० आन्दोलन में उन्होंने श्रीमती इन्दिरा के तानाशाही के खिलाफ छिड़े संघर्ष में मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का काम किया। जे०पी० आन्दोलन के क्रम में छात्रों पर हुए, पटना गोली कांड के खिलाफ, पटना बंद के कार्यक्रम में वे हमारे साथ शिरकत करने का काम किया। इस आन्दोलन में श्री जलवदेव प्रसाद और राम- गोबिंद सिंह की गिरफ्तारी हुई थी। जिसके विरूद्ध द्वारिका प्रसाद के नेतृत्व में हम सब ने पटना कोतवाली थाना का घेराव किया था।

कह सकते है कि शहीद द्वारिका प्रसाद पहले वैसे नेता थे जिन्होंने डौं० लोहिया, डॉ० अम्बेदकर, और शोषित क्रांति के पुरोधा शहीद जगदेव प्रसाद के सपनों को साकार करने का काम किया था। सदियों से दबे कुचले वर्गो में चेतना जगाकर, उनके सुप्त सपनों में नवजीवन का संचार किया। इन वर्गों में लोकतंत्र और समाजवाद के अस्तित्व का एहसास कराया। द्वारिका प्रसाद के बाद, काफी समय और अवसर निकल चुका है। यह अवधि किसी समाज के राजनैतिक और सामाजिक परिदृष्य में परिवर्तन लाने के लिए प्रयाण्त है, जिसे हमें स्वीकार करना है। समाज में काफी गिरावट आये है। आगे लोकतंत्र पर कई प्रकार के खतरे आने वाले है। तब हमें कोई मिट्टी से जुड़े व्यक्तित्व की आवश्यकता होगी और तब हमें शहीद द्वारिका प्रसाद के विचार और क्रम में प्रवृत्त होने

सम्पर्क :- समाजवादी विचारक
ग्राम :- लाव
पो० :- टिकारी
जिला :- गया (बिहार)

 
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शिक्षा विकास में योगदान

 

इन सारे कार्यों के भ्रमण के दौरान मजदुर किसान कॉलेज, पांकी (पलामू) के व्याख्याता श्री उमेश प्रसाद दांगी तथा श्री रामानुज प्रसाद दांगी से डाल्टेनगंज में भेट हुई I उपरांत दोनों को गया लौटाकर गुरुआ इण्टर कॉलेज, गुरुआ का प्रिंसिपल श्री रामानुज प्रसाद दांगी एवं किसान इण्टर कॉलेज, कोरमा (गया) का प्रिंसिपल श्री उमेश प्रसाद दांगी को बनाकर कॉलेज संचालित करवाया I अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वे संस्थापक के रूप में रहे I

 
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शहीद द्वारिका प्रसाद का नौकरी से त्याग- पत्र क्यों और कैसे ?

शहीद द्वारिका प्रसाद का नौकरी से त्याग- पत्र क्यों और कैसे ? :-

अखिलेश्वर प्रसाद सिंह, हरिहरगंज, पलामू

 

जिन बातों के लिए शहीद जगदेव प्रसाद शोषितों- दलितों को हक- अधिकार दिलाने के लिए अपनी कुर्बानी कुर्थी मेँ शांतिपूर्ण सत्याग्रह करते हुए गत 5 सितंबर, 1974 को दी थी, उनकी कुबानी से शहीद दवारिका प्रसाद को बहुत आघात पहुंचा था | मेरी मुलाकात द्वारिका बाबू से 1978 में संदेश उपचुनाव के लिए सहयोग मांगने के क्रम में मुहम्मदगंज में नवंबर के प्रथम सप्ताह में हुई थी। उसी दरम्यान उन्होंने कहा था कि यह मुलाकात हमारी आपसे अनायास हुई है।क्या आप आजीवन इसी रास्ते पर चलेंगे या नौकरी में चले जायेंगे ? मै नौकरी में आकर बहुत पश्चाताप कर रहा हूं। क्योंकि जिनके द्वारा मै प्रेरणा लेकर ऊंची शिक्षा प्राप्त की, उनकी कुर्बानी मुझे हमेशा झकझोरती रहती है। अधिक दिनों तक इस सरकारी नौकरी में नहीं रह पाऊंगा, क्‍योंकि जिन कारणों से जगदेव बाबू परैया हाई स्कूल छोड़कर चले गए थे, वहीं कारण मै भी यहां नौकरी में देख रहा हूं। द्वारिका बाबू, कृष्णदेव निर्मोही, रामेश्वर प्रसाद, रामनाथ सिंह, रामबचन पाल, महबूब अंसारी, इन सभी लोगो ने हुसेनाबाद की जनता को नई चेतना प्रदान की जिसका अग्रणी शहीद द्वारिका प्रसाद को हुसेनाबाद की जनता जानती

जिन कारणों से द्वारिका बाबू ने नौकरी छोड़ी ,वह भी एक अविस्मरणीय घटना है। द्वारिका बाबू की पदोन्‍नति हो गई थी। वहां के सभी सवर्ण कर्मचारियों ने इनका घोर विरोध किया और ऊंची जाति के अधीक्षण अभियन्ता सी० डी० एन० प्रसाद ने हस्तक्षेप कर कार्यपालक अभियमन्ता सुब्रत सिंहा विश्वास से पदोन्‍नति रद्द करवा दी। उनकी योग्यता व कर्मठता से सवर्ण पदाधिकारी नफरत करते थे। द्वारिका ने शपथ लेकर नौकरी छोड़ी की “मै अपना एक- एक बूंद रक्त शहीद जगदेव प्रसाद के सपने को साकार करने में लगा दूंगा।” उन्होंने 1980 के विधानसभा मध्यावधि चुनाव के मौके पर नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया और हुसेनाबाद का चुनाव शोषित समाज दल के टिकट पर लड़ा।

द्वारिका बाबू का त्याग-पत्र देने से वहां पिछड़े व दलित कर्मचारी बहुत मर्माहत हुए और हुसेनाबाद के चुनाव मैं उन सभी कर्मचारियों ने भरपूर मदद की। द्वारिका बाबू की नौकरी छोड़ने की चर्चा सवर्णों ने पूरे जिला स्तर पर की। सवर्ण पदाधिकारियों व कर्मचारियों में यह भावना थी कि शहीद जगदेव प्रसाद की भांति ही द्वारिका प्रसाद पिछड़ों व दलितों को संगठित कर देगा तो हम सभी लोगों का शान- शौकत नष्ट हो जाएगा। 1980 के विधानसभा हुसेनाबाद से द्वारिका के विरोध में सवर्णों ने कर्पूरी ठाकुर से मिलकर लोक दल का उम्मीदवार रामविलास मेहता को बनवाकर पिछड़े मतो को बांटने का काम किया। द्वारिका बाबू इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने कहा कि मै चुनाव जीतने के लिए नहीं लड़ रहा हूं बल्कि मै भावी रास्ता को तय करने के लिए यह चुनाव लड़ रहा हूं। अगर मै चुनाव जीत जाऊंगा तो शहीद जगदेव प्रसाद जैसा विधानसभा में 90% शोषितों के हक है व अधिकार के लिए लड़ंगा और अगर चुनाव हार जाऊंगा जो जगदेव बाबू की भांति शोषित जनता को देश के बारे में सही दिशा बताकर उन्हें गोलबंद करूंगा।

मैं द्वारिका बाबू, रघुनीराम शास्त्री, विष्णुदेव प्रसाद मेहता, कन्हाई प्रसाद मेहता, विश्वनाथ राम, कृष्णा प्रसाद मेहता, रामवृक्ष मस्ताना, रामचंद्र चौधरी, रामसुंदर प्रसाद मेहता, दशरथ मेहता आदि पैदल चलकर गांव- गांव में दल के सिद्धांत व नीतियों को बताकर शोषित जनता को प्रेरित किया था। आज भी उन क्षेत्रों की मां- बहने द्वारिका बाबू के बारे में पूछती हैं -“द्वारिका बाबू कैसे हैं” जब उनकी कुर्बानी की बात उन सबों के समक्ष कहता हूं तो वे सभी रो पड़ती हैं और वे कहती है उनकी हत्या आखिर किन लोगों ने कि? जब मैं कहता हूं कि उनकी हत्या तथाकथित एम० सी० सी० के गुंडों ने कि। वे कहती हैं - जब द्वारिका बाबू जैसे नेता को एम० सी० सी० के लोग मार सकते है तो वे फिर किसी की भलाई नहीं कर सकते।

शहीद द्वारिका बाबू का खून पलामू के कसमार में गिरा है। वह खून एक न एक दिन जरूर रंग लाएगा, उसी प्रकार जगदेव बाबू का खून कूर्था में गिरा था, तो पूरे देश में रंग लाया। जगदेव बाबू कुरहारी में जन्म लेकर कुर्था में शहीद 10 कि० मी० की दूरी पर हुए। द्वारिका बाबू का खून मरांची से कसमार में गिरा है। यह दूरी 50 कि० मी० की है। जगदेव बाबू की कुबानी कांग्रेस व इंदिरा गांधी सहित समस्त भूमिहारों का अंत कर रही है, उसी प्रकार द्वारिका प्रसाद की कुर्बनी एम० सी० सी० के बिकाऊ गुंडों का अंत करेगी।

द्वारिका बाबू ने अपनी कुर्बानी देकर एक नई रोशनी दी है। उनकी कुर्बानी कभी व्यर्थ नहीं जा सकती, उनके सपने को साकार करने के लिए मै अंतिम क्षण तक प्रयास करता रहूंगा | यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि

जय शहीद द्वारिका प्रसाद !

 
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अमर शहीद द्वारिका प्रसाद और अर्जक संघ का मानववादी दर्शन

अमर शहीद द्वारिका प्रसाद और अर्जक संघ का मानववादी दर्शन:-

प्रो० रामकृष्ण प्र० यादव

 

ऐतिहासिक तथ्यों से यह प्रमाणित है कि मानव की समृद्धि समता में अधिक होती है। मानव - मानव की सचेत समता का सिद्धान्त जिस मानव समूह में अधिक प्रतिष्ठित हुआ है, समृद्धि उसकी ही अधिक हुई है| मानव -- मानव की सचेत बराबरी का अर्थ है कि लोग सचेत रूप से बोलने - चलने, उठने - बैठने और खान - पान में परस्पर समता बरते और जो बात स्वयं को अच्छी न लगे, वह दूसरों के साथ न करें। इससे शोषण विहीन सभ्य मानव तैयार होते हैं। मानव - मानव की बराबरी का सिद्धान्त शोषण का घोर विरोधी है। अतः जो राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मानवों का शोषण न करके अपने बराबर समझेगा, आगे विश्व में इतिहास में वही समृद्ध होगा। विज्ञान के कारण विश्व के मानवों की निकटता जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव - मानव की बराबरी की होड़ पैदा कर देगी। किन्तु एक प्रश्न अपने आप उठता है कि क्या मानव समता का सिद्धान्त नैसर्गिक (प्राकृतिक) है?

उपयुक्त प्रश्न का उत्तर अर्जक संघ के अनुसार हाँ में है। फिर भी इतना कहने मात्र से कोई संतुष्ट नहीं होगा। इसके लिए इस नियम की नैसर्गिकता या स्वाभाविकता का पता निसर्ग यानी प्रकृति से लेना पड़ेगा। प्रकृति में दो तरह के जीव पाए जाते हैं, सहज बुद्धि वाले और, विवेक बुद्धि वाले। मानव को छोड़कर शेष सारे जीव सहज बुद्धि वाले हैं। यानी उनमें सोचने - विचारने की शक्ति नहीं है। वे अपनी रक्षा सहज बुद्धि के द्वारा करते हैं। जैसे गहरी नदी में मानव को छोड़कर किसी भी जीव के बच्चो को डालें, तो वह तुरंत तैरने लगेगा, किन्तु मानव का बच्चा नहीं तैर पायेगा और डूबकर मर जाएगा। मानव को विवेक बुद्धि प्राप्त है। अतः वह सोंच विचार कर तैरने की कला सीख सकेगा। सृष्टि के जीवों का यह अन्तर यह दोनों में भेद पैदा करता है। अतः मानव को छोड़कर सारे जीव हम जिन्स का गुलाम नहीं अर्थात्‌ चींटी - चींटी का गुलाम नहीं, बकरी - बकरी का गुलाम नहीं, हाथी - हाथी का गुलाम नहीं आदि। यानी सारी सृष्टि में हम जिन्स में बोलने - चलने, उठने - बैठने और खान - पान में बराबरी का सिद्धान्त प्राकृतिक है, सहज है, स्वाभाविक है। अतः इस प्राकृतिक सिद्धान्त का उल्लंघन जब मानव करता है तो उसे उसका दण्ड भुगतना पड़ता है क्योंकि यह प्रकृति के प्रतिकूल है। जो दूसरे को नीच समझते है, वे स्वयं किसी के द्वारा नीच समझे जाने लगते हैं। मानव समता का जो जितना अधिक विस्तार करता है वह उतना ही अधिक शक्तिशाली और समृद्ध बन जाता है। शहीद द्वारिका प्रसाद मानव - मानव की सचेत समता के प्रबल समर्थक थे। वे अछूत कहे जाने वाले समाज के ललन मांझी को अन्तिम समय में जय अर्जक और जय शोषित कहते हुए ही प्राण त्यागा था। उपुर्यक्त नैसर्गिकता का तथ्य मानवीय जीवन से भी सिद्ध है। मनुष्य का तन पदार्थ से निर्मित है और इसकी गति है मन। जब तक शरीर संगठित संरचना के रूप में चेतना सम्पन्न है तब तक मन (गति) शरीर में विद्वान है। तन शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, पौष्टिक भोजन और चोट रहित रहने पर स्वस्थ रहता है और मन आदर मिलने पर प्रसन्‍न रहता है। आदर किसी से मिलने में यह निहित है कि दूसरा मनुष्य होना चाहिए| इस लिए समाज शास्त्रियों ने मन की इस आवश्यकता को जानकर ही सर्वसम्मति से घोषणा की कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यानी वह अकेले नहीं रह सकता; उसे और लोग चाहिए, तभी उसके मन की आदर की भूख शान्त होगी। इसलिए मन से स्वस्थ समाज वही होगा जिसमें हर एक को आदर मिले और यह तभी संभव है। जब मनुष्य हर एक को आदर दे व ले। अतः आदर देने व लेने की क्रिया को सचेत बराबरी की संज्ञा दी जाती है। आदर देना व लेना छः क्रियाओं में सम्भव होता है। यानी बोलने व चलने में, उठने व बैठने में, खान व पान में इन क्रियाओं में परस्पर आदर का पता लगता है। इसलिए मानव समता इन छः क्रियाओं में लागू होना प्राकृतिक आवश्यकता है। इससे मानव समाज मन से स्वस्थ बनता है। इसके विपरीत विषमता होना प्रकृति के प्रतिकूल होने के कारण पतनकारी है। विवेक बुद्धि का प्रयोग करने पर मानव इस सत्य को आवश्यक जाना जाएगा और विवेकहीन होने पर मानव इन्सान नहीं रह जाएगा।

जीवों की उत्पत्ति के पदार्थवादी सिद्धान्त का द्वारिका प्रसाद जी को गहन अध्ययन था। वे अपने भाषणों में इसकी स्पष्ट व्याख्या किया करते थे। चौधरी महाराज सिंह भारती द्वाग लिखित पुस्तक “सृष्टि और प्रलय” के विश्लेषण में उन्हें महारत हासिल था। अर्जक संघ के द्वारा आयोजित सभा में अपने विचारों की पुष्टि पदार्थवादी सिद्धान्तो से किया करते थे।

पुनर्जन्म और भाग्यवाद के आधार पर टिके ब्राह्मणवाद ने मानवीय विषमता के घिनौने और जघन्य स्वरूप को उजाकर किया। दुनिया के किसी भी हिस्से में इतनी अधिक विषमता मानव- मानव के बीच इतने बड़े पैमाने पर नहीं रही, जितनी भारत में ब्राह्मणवाद ने पैदा की। यही कारण है कि मानव सभ्यता के नैसर्गिक (प्राकृतिक) सिद्धान्त के विपरीत चलने वाले ब्राह्मणवाद में यह दम नहीं था कि वह शक्तियां विचार के बल पर दूसरे देश के मानवों को प्रभावित कर सके। ब्राह्मणवाद का सिद्धान्त अप्राकृतिक होने के कारण मानव को प्रभावित नहीं कर सकता। आखिर अशोक तो भारत भूमि पर ही पैदा हुए थे जिन्होंने अहिंसा के बल पर ही मानव सभ्यता के प्राकृतिक विचार को एशिया के बहुत बड़े भू - भाग में फैलाया। यदि ब्राह्मणवाद में दम होता तो दुनिया के बीच फैलाया जा सकता था। अर्जक संघ तथ्यो एवं तर्को के आधार पर समतामूलक मानवतावादी विचारधारा का प्रबल समर्थक है। ब्राह्मणवादी गुलामी का पोषक होने के कारण कभी गुलामी से मुक्ति नहीं दिला सकता। उसमें मानव सुलभ गुणों का न तो विकास सम्भव है और न वह सच्चे मायने में इंसान ही पैदा कर सकता है। विवेकशील प्राणी एक क्षण भी गुलाम रहना पसन्द नहीं करेगा। जो मानव - मानव की बराबरी के प्राकृतिक सिद्धान्त को मानता है वही विवेकशील होने के कारण सच्चा इन्सान है। अर्जक संघ इसी प्रकृति सत्य पर आधारित है कि “समता बिना समाज नहीं” शहीद द्वारिका प्रसाद विवेकशील प्राणी होने के कारण ही “जनो तब मानो” का सिद्धान्त अपनाकर अर्जकों के बीच अलख जगाने के लिए अपने घर से निकलकर बाराचट्टी, इमामगंज, डुमरिया और पांकी जैसे पिछड़े क्षेत्रों में अपना नारा बुलंद करते हुए प्राण का उत्सर्ग किया। अतः वे एक सच्चे इंसान थे।

मानव निर्मित या उत्पादित जो भी है वह सब शारीरिक श्रम के द्वारा ही हो सकता है, इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं। मन से हम चाहें जिस रचना की कल्पना करते रहे, लेकिन वह तभी हो सकेगी, जब शारीरिक श्रम उसमें लगाया जाय। अतः शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता मानना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है। मानसिक श्रम किसी रचना या उत्पादन में सहायक हो सकता है किन्तु इसकी स्थिति बिना शारीरिक श्रम के सम्भव नहीं; जबकि शारीरिक श्रम अपने सहज भाव में भी रचना अथवा उत्पादन का काम करता रहता है। किन्तु भारत में तथाकथित उच्चवर्णीय लोगों ने अपने को शारीरिक श्रम द्रोही बनाकर उसी की श्रेष्ठता का गान किया। भिक्षा मांगने वाले एक वर्ग स्वाभिमान का अनुभव कर्ता है जबकि यह किसी वर्ग या व्यक्ति की गिरावट की अन्तिम सीढ़ी है। यदि इस भिक्षा को सभी श्रेष्ठ समझकर अपना लें तो फिर उत्पादन कौन करेगा और फिर किससे भीख मांगी जाएगी? भीख मांगकर स्वाभिमान का अनुभव करने वाला वर्ग अपने को श्रेष्ठ समझता है और कठिन शारीरिक श्रम करने वाले को नीच समझता है, नहीं तो “भंगी कैसे न छूने योग्य” द्विज कैसे पूज्य बन गया?” भंगी के अभाव में तो सडांध और गन्दगी की घुटन से व्यापक विनाश हो सकता है किन्तु द्विजों के अभाव में समाज का कुछ भी नहीं बिगड़ता। श्रमशील कौमों के पास चाहें खाने के लिए अन्न न हो लेकिन, शारीरिक श्रम को नीच समझने वाले द्वीजों के पास बिना कमाये अन्न के भंडार भरे रहते हैं। योग का दावा करने वाली कौमों भोग में लिप्त है और श्रमशील कौमों कमाकर भोगने नहीं पाती। दुनिया में काम ही पूजा है और भारत में पूजा ही काम। शहीद द्वारिका प्रसाद शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता के प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने नौकरी छोड़कर न आजीविका के लिए खेती को अपना पेशा अपनाया। वे अपने भाषण में कहा करते थे कि भारत विश्व में अकेला ऐसा देश है जहां श्रम की प्रतिष्ठा है। श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित किए बिना भारत समृद्ध नहीं हो सकता। जब तक उपर्युक्त विसंगति को दूर नहीं किया जाता तब तक भारत का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा; क्योंकि 87% शारीरिक श्रमशील कौमों (अर्जक ) का शोषण 3% शारीरिक श्रमद्रोही (अनर्जक) कौमों कर रही हैं। अनर्जकों ने इस भय से कि उनकी अर्जको के शोषण करने की पोल न खुल जाय, देश में जाती प्रथा को जन्म दिया और इसकी सार्थकता का इतना अधिक प्रचार पुनर्जन्म और भाग्यवाद के भ्रामक सिद्धान्तों के जरिये किया कि अर्जकों में एक बुद्धि विभ्रम छा गया और वे परस्मर विभाजित हो गए अर्जक संघ इस बुद्धि - विभ्रम को समाप्त कर अर्जकों में शारीरिक श्रम की समता के आधार पर एकता और शारीरिक श्रम की महत्ता को प्रतिष्ठित करना चाहता है जिससे शारीरिक श्रम के शोषण का अन्त और निररथक जाती प्रथा की समाप्ति हो। अर्जकों में सामाजिक गैरबराबरी का बीज बोने वाले अनर्जकों के द्वारा किये जाने वाले ऐसे सभी कामों या बातों का बहिष्कार करना होगा, जिनमें समाजिक कुण्ठा, असमानता और आर्थिक शोषण को प्रोत्साहन मिलता है।

स्त्रीयों को हेय समझने की कुप्रवृत्ति को समाप्त करना होगा और स्त्री - पुरुषों को परस्पर एक दूसरे का अनुपूरक व सहायक समझते हुए समता के धरातल पर लाना होगा। द्वारिका प्रसाद इसी काख्वां को आगे बढ़ाने के दौरान अपने प्राण का बलिदान दिया।

भारत के पतन की सर्वाधिक जिम्मेदार इस जाति प्रथा ने भागतीय समाज को न केवल अर्जको और अनर्जकों के रूप में विभाजित किया बल्कि अर्जक की कमाई का शोषण करने का प्रबल कुचक्र भी रचा, जिसके परिणाम स्वरूप उद्योग - धन्धों और व्यापार में 93% पर अधिकार 3% अनर्जकों ने कर लिया और केवल 7% उद्योग - धन्धे और व्यापार 87% अर्जकों के पास रह गए हैं। अर्जकों का उपयोग केवल उत्पादक श्रम के रूप में होता रहा लेकिन उत्पादन, विनियम और वितरण पर पूर्ण नियंत्रण अनर्जकों का ही रहा। औद्योगिक और व्यापारिक आधिपत्य अनर्जकों का होने के कारण उन्होंने अर्जकों का दोहन - शोषण किया, यानी उत्पादन श्रम के रूप में उनके श्रम का तो शोषण किया ही, उपभोक्ता के रूप में भी 87% अर्जकों का ही शोषण होता रहा। अर्जक संघ को इसके लिए सचेत राष्ट्र प्रेमी अर्जकों का संगठन आर्थिक समितियों के रूप में करना होगा, ताकि उत्पादक, वितरक और उपभोग अर्जकों का सचेत दल तैयार हो सके और समूचे देश में उद्योग और व्यापार में सच्चाई और शोषणरहित होने के कारण प्रगति के लक्षण दृष्टिगोचर हो सके तथा अर्जकों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। द्वारिका बाबू अर्जकों के अधिकार दिलाने के लिए कृतसंकल्प थे।

उपुर्यक्त सामाजिक और आर्थिक जगत में मंसूबों की पूर्ति तभी सम्भव है जब सांस्कृतिक क्षेत्र में जीवन के पूर्व निर्धारित मूल्यों का पुर्निधारण किया जाय पुनर्जन्म और भाग्यवाद जैसे बुद्धि - विभ्रम कारक एवं विषमता मूलक सिद्धान्तों से मुक्ति दिलाने के लिए सफल एवं सक्षम प्रचार करना होगा ताकि अर्जक मूर्छा से जाग उठे। नाटक, ड्रामा, सिनेमा जैसे दर्शनीय कलाओं का भी प्रबल योगदान लेना होगा। अर्जक परस्पर समता के व्यवहार और आचरण पर विश्वास करें और चलें तभी शोषण रहित आदर्श समाज का निर्माण सम्भव है। जिससे मानव समाज की धारणा प्रतिपादित एवं समृद्ध हो, अर्जक संघ उसे ही धर्म समझता है। अर्जक संघ सभी धर्मों को इसी व्यापक अर्थ में देखता है और उनमें परस्पर सौहार्द्र की भावना लाने का प्रयास करता है, क्योंकि सभी धर्मों में अर्जक एक सी दरिद्रता और दुख के शिकार हैं और उन्हें इस दरिद्रता, निरादर और वैमनस्य से उबारने में ही अर्जकों का हित निहित है। अपने सिद्धान्त को अमलीजामा पहनाने के लिए द्वारिका जी ने बागचट्टी प्रखण्ड में सुलेबट्टा और इमामगंज प्रखण्ड के रानीगंज में 25, 26, 27 फरबरी 999 को जगदेव मेला लगाकर जादू प्रदर्शित कर एवं नाटक का मंचन कर अर्जकों के दिमाग से बुद्धि विभ्रम को दूर करने का अभियान चलाया। इसके कारण उन्हें काफी ख्याति भी मिली। यही कारण है कि वे अन्य राजनीतिक दलों के आंखों की किडकीडी बन गए थे।

अर्जक संघ प्रबल मानव मैत्री और देश भक्ति का हिमायती हैं, क्योंकि जहां एक ओर इससे अनाचार, असत्य, आलस्य, अय्याशी और असमानता पर दारुण प्रहार होता है, वहीं दूसरी ओर सदाचार, सच्चाई, सचेष्टता, सादगी और समता में अपार वृद्धि होती है। कहना न होगा कि पहले किसी राष्ट्र अथवा व्यक्ति के कारण हैं दूसरे उसकी उन्नति के सोपान होते हैं। शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता पर विश्वास रखने के लिए यह आवश्यक होगा कि प्रत्येक अर्जक जो मानसिक श्रम में लगा हुआ है कम- से-कम एक घंटा प्रतिदिन उत्पादक शारीरिक श्रम करे और मानसिक विकास के लिए भी यह अपेक्षित है ताकि शारीरिक श्रम में लगा हुआ प्रत्येक अर्जक एक घंटा मानसिक श्रम करे, जिसमें पढ़ने - लिखने का काम हो। इससे तन और मन से स्वस्थ अर्जकों की वृद्धि होगी। अर्जकों में स्वावलम्बन के फलस्वरूप स्वाभिमान का उदय होगा ताकि वे अनर्जकों से अपने को उत्तम समझें। द्वारिका बाबू वास्तव में सदाचार, सचेष्टता, सादगी और समता के प्रतीक थे। अर्जकों में स्वावलम्बन पैदा करने के लिए शोषित समाज दल का सिद्धान्त समान रूप से अपने भोषणों में रखा करते थे। अर्जकों की प्रतिष्ठा में जय अर्जक और जय शोषित का अभिवादन किया करते थे।

अर्जक संघ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में विकास के पथ में आने वाली बाधाओं और रुकावर्टो को अहिंसक आन्दोलन या सिविल नाफरमानी द्वारा दूर करने में विश्वास करता है। इसके सिद्धान्त के तहत शहीद द्वारिका प्रसाद अर्जकों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए कर्मवार, अहिंसक, आन्दोलन चला रहे थे।

गांव - गांव घूमकर सभा करना, गीत - संगीत के द्वारा आम जनों तक अपनी बात पहुंचाना उनका मुख्य लक्ष्य था। इसी क्रम में पलामू जिले के पांकी प्रखण्ड स्थित कसमार गांव में संध्या के समय भाषण कर रहे थे। इसी बीच कुछ उम्रवादी उनके भाषण के दौरान हस्तक्षेप किया। उन्होंने उनलोगों से स्पष्ट कहा कि हमें आप लोग तर्क से गलत साबित कर दें तो मैं हर तरह की सजा भुगतने को तैयार हैं। लेकिन उग्रवादियों ने एक न सुनी और सभा से दूर ले जाकर निहत्थों पर लाठी बरसाने लगे। द्वारिका बाबू के साथ परमेश्वर प्रसाद और ललन मांझी भी गिरकर ढेर हो गए। कुछ ही क्षण के बाद द्वारिका प्रसाद, ललन मांझी और परमेश्वर प्रसाद से जय अर्जक और जय शोषित कहते हुए यह भी कहा कि में यह काला झंडा आपलोगों को सौंप कर सदा - सदा के लिए शान्त हो गई। इस प्रकार एक क्रान्ति वीर इस धरती से उठ गया।

-रैडर भूगोल विभाग, गया कॉलेज, गया

 
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